खेलों में और भी बेहतर प्रदर्शन की दरकार, जानें क्या बोले पहलवान फोगाट

महावीर फोगाट, प्रसिद्ध पहलवान( समाचार पत्र से साभार)

दक्षिण कोरिया में आयोजित 2014 के एशियाई खेलों में भारत ने 11 स्वर्ण सहित कुल 57 पदक जीते थे। इस बार इन पंक्तियों के लिखे जाने तक हमारे खाते में 26 पदक आ चुके हैं, जिनमें चार स्वर्ण हैं। इन चार तमगों में से दो हमने कुश्ती में कमाए। इसे देखकर कोई भी यह कह सकता है कि जब 2014 में योगेश्वर दत्त के रूप में हमें सिर्फ एक सोना मिला था, तब इस बार कुश्ती में हम बेहतर खेल रहे हैं। लड़कियां और लड़के बराबर की टक्कर दे रहे हैं। मगर मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि हमारे खिलाड़ी इससे कहीं बेहतर खेल दिखा सकते थे। जकार्ता से हम इससे ज्यादा सोना और अन्य पदक ला सकते थे।

अपनी बातों को स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण देना जरूरी समझता हूं। हमारे देश में कुश्ती के एक बड़े खिलाड़ी हैं, जिन्होंने दो ओलंपिक खेलों में दो पदक जीते हैं। 2008 ओलंपिक में कांस्य और 2012 में रजत। मगर जकार्ता एशियाई खेलों से वह टूर्नामेंट से ही बाहर हो गए। अब, जो खिलाड़ी ओलंपिक पदक जीत चुका हो, वह यदि एशियाई खेलों से इस तरह बिना पदक लिए वापस आ जाए, तो निराशा स्वाभाविक ही है। उसे तो सोना जीतना चाहिए था। साफ है, कहीं न कहीं कुछ लापरवाही बरती गई है।

अब तो यह तर्क भी नहीं चल सकता कि खिलाड़ियों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं या सरकार उनकी अनदेखी कर रही है। आज केंद्र सरकार हो या राज्यों की सरकारें, सभी खिलाड़ियों का पूरा ध्यान रख रही हैं। खिलाड़ियों को खुद का ध्यान रखना है। जरूरत बस इस बात की है कि खिलाड़ी लगातार मेहनत से अपनी तैयारी करें। दुर्भाग्यवश इसी में हम पीछे हो जाते हैं। अमेरिका, रूस, जापान, चीन, ईरान या फ्रांस जैसे देशों के रेसलर हम पर आखिर भारी क्यों पड़ते हैं? आज कुश्ती में जिस तरह से तकनीक का दखल बढ़ा है, उसे देखकर तो यह कोई नहीं कह सकता कि सामने वाले खिलाड़ी की शैली से वह अनजान था। अब तो सारी रणनीति पहले ही बना ली जाती है। मगर मुश्किल यह है कि हमारे खिलाड़ी तभी जागते हैं, जब प्रतियोगिता सिर पर आ जाती है। पूरे साल तो छोड़िए, छह महीने भी वे जमकर पसीना नहीं बहाते। अनुशासन में रहना तो दूर की बात है। अब इस स्थिति में हमें पदक भला कैसे मिल सकता है?

खिलाड़ियों की अपनी मानसिकता भी उनके विकास में बड़ी बाधक है। उनकी सोच ओलंपिक में सोना जीतने की शायद ही होती है। वे चाहते हैं कि बस ‘बाहर’ से कोई मेडल ले आएं, ताकि उन्हें नौकरी वगैरह मिल सके। इसीलिए उनकी नजर अपेक्षाकृत छोटे मुकाबलों पर ज्यादा रहती है। बड़ी दिक्कत यह भी होती है कि अगर किसी खिलाड़ी को इंटरनेशनल पदक मिल गया, तो वह खुद को ही कोच समझने लगता है। पाबंदी उसके लिए मायने नहीं रखती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।

कोच को भी पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। उसे तो यह उद्देश्य लेकर ही आगे बढ़ना होगा कि अपने खिलाड़ियों से वह देश को ओलंपिक का स्वर्ण दिलवाएगा। कोच को खिलाड़ियों को जगाना होगा। यही बात प्रायोजकों पर भी लागू होती है। उन्हें खिलाड़ियों पर हर मुमकिन दबाव बनाना चाहिए। जब पैसा वह दे रहा है, तो खिलाड़ियों से बेहतर नतीजे हासिल करवाने के लिए भी उसे अपनी तरफ से प्रयास करने चाहिए। अब प्रशिक्षण की कोई कमी नहीं होती। खिलाड़ियों को पूरी सुख-सुविधाएं भी मिलती हैं, तो फिर उनसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन और पदक की उम्मीद भला क्यों नहीं पाली जाए?

अपने समय से यदि आज की तुलना करूं, तो स्थिति काफी बदली हुई दिखती है। मानो जमीन-आसमान का फर्क आ गया हो। हमारे दौर में न तो तकनीक का इतना बोलबाला था, न हमारे पास मैट थे। इतनी प्रतियोगिता भी तब नहीं हुआ करती थी, जाहिर तौर पर सरकार की तरफ से मदद भी नाममात्र की मिलती थी। अब ऐसा नहीं है। सरकारें खेल पर दिल खोलकर खर्च करती हैं। आज न सिर्फ खेलों में बदलाव आया है, बल्कि कायदे-कानून भी काफी बदले हैं। मगर सच यही है कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। मैट पर पसीना बहाने वालों को कोई रोक नहीं सकता। मगर हम तो हर टूर्नामेंट के बाद एक-दूसरे को दोष देने में व्यस्त रहते हैं।

कुश्ती की बात करूं, तो यह ताकत का खेल है। जाहिर है, इसके लिए मेहनत ज्यादा करने की जरूरत होती है, इसीलिए हमारी डाइट (खान-पान) भी ‘हैवी’ होती है। इससे वजन स्वाभाविक तौर पर बढ़ जाता है। मगर अब हमारे खिलाड़ी प्रतियोगिता से ऐन पहले वजन कम करने में जुट जाते हैं। इससे उनका वजन बेशक कम हो जाता है, पर उनकी ताकत भी घट जाती है। यह तरीका गलत है। फिर आज के खिलाड़ियों के लिए अच्छी बात यह भी है कि उनके पास अपनी कमजोरी आंकने के ढेरों अवसर उपलब्ध हैं। कोई न कोई प्रतियोगिता चलती ही रहती है, जिसमें भाग लेकर कोई भी खिलाड़ी अपनी क्षमता परख सकता है। अपनी ‘टेक्नीक’ जान सकता है। मगर वे ऐसा करें, तब तो! सच है कि वे किसी समग्र सोच के साथ आगे बढ़ना ही नहीं चाहते।

यही वह कारण है कि मैं खिलाड़ियों को ज्यादा दोषी मानता हूं। देर अब भी नहीं हुई है। हालात सुधारे जा सकते हैं। दो साल बाद ओलंपिक का मुकाबला है। अगर हम ठान लें कि इस बार गोल्ड लेकर ही आएंगे और उसी के मुताबिक अभी से मेहनत करने में जुट जाएं, तो फिर भला हमें कौन हरा सकता है? भारत की मिट्टी में बहुत ताकत है। इसमें असीम ऊर्जा है। खिलाड़ी इस मिट्टी को पहचानें और जमकर पसीना बहाएं। उनकी यही मेहनत हमें ओलंपिक में स्वर्ण दिला सकती है और कुश्ती का सिरमौर बना सकती है।

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