कैंसर ने सूनी की थी इस मां की गोद, अब 46 बेसहारा बच्‍चों का करती है पालन-पोषण

हमारे देश को भले ही पुरुष प्रधान देश समझा जाता हो, लेकिन आज भारत के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी है। इसके बावजूद कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में एक अभिशाप बना हुआ है। कई दंपति‍ बेटे की चाहत में गर्भ में पल रही बेटियों की जन्म से पहले ही हत्या कर देते हैं। हम आपको एक ऐसे ही दंपति से रूबरू करा रहा है। उनकी अपनी कोई संतान नहीं है। इसके बावजूद वे 46 अनाथ और विकलांग बेसहारा बच्चों की देखभाल माता- पिता की तरह कर रहे हैं। इस परिवार में 25 बेटियां और 21 लड़के हैं। परिवार की कई युवतियां स्नातक की पढ़ाई कर चुकी हैं।

गर्भाशय के कैंसर ने सूनी की मीना की गोद 

गर्भाशय के कैंसर ने न सिर्फ वीरेंद्र राणा की पत्नी मीना राणा की गोद सुनी कर दी, बल्कि उसकी जीने की आस भी खत्म हो चुकी थी। दंपति ने अपने हौसलों से न सिर्फ मौत का रुख मोड़ दिया, बल्कि मातृत्व का एक नया अध्याय लिखकर इतिहास रच दिया है। अब ये दंपति एक नहीं 46 बच्चों के मां-बाप हैं। भले ही इन बच्चों ने इस मां की कोख से जन्म नहीं लिया हो, लेकिन बेसहारा और गरीब बच्चे मीना राणा को भगवान से कम नहीं समझते हैं।

शुक्रताल के इस अनाथ आश्रम में सभी धर्म के बेसहारा बच्चे रहते हैं। बागपत में अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती-बाड़ी कर वीरेंद्र राणा इस आश्रम का खर्च चलाते हैं। आसपास के ग्रामीण भी समय-समय पर इस आश्रम की आर्थिक मदद करते रहते हैं।

एक साथ 46 बच्‍चों का पालन-पोषण करते हैं दंपति 

कई बार आर्थिक संकट इनके आड़े आया, लेकिन इन दोनों ने कभी हिम्मत नहीं हारी। मीना राणा को अपनी तो कोई संतान नहीं है, लेकिन मीना बेघर और बेसहारा 46 बच्चों की मां जरूर है। मीना इन्हें अपने आप से ज्‍यादा प्यार करती है। फिर चाहे ये बालक अपंग हों या फिर मंद बुद्धि हों, मीना सभी बच्चों को बराबर प्यार देती है। इन सबके बावजूद सरकार मीना की भावना और बलिदान की अनदेखी कर रही है।

19 साल पहले एक बच्‍चे को लिया गोद 

दिल्ली तक इलाज कराने के बाद भी उम्मीद की कोई किरण नहीं जागी। वीरेंद्र राणा अपनी पत्नी मीना को लेकर धर्म नगरी शुक्रताल आ गया। यहां आकर दोनों ने 19 साल पहले एक बच्चे को गोद ले लिया। धीरे-धीरे आयुर्वेद के उपचार और गोद लिया हुआ पहले बच्चे की दुआ का असर होने लगा और मीना का स्वास्‍थ्‍य ठीक होने लगा। गोद लिए बच्चे मांगेराम का कदम घर में पड़ते ही परिवार भी बढ़ता चला गया। अब तक दोनों दंपति‍ के पास लगभग 46 बच्चे हैं जिनमें 25 बेटि‍यां  और 21 लड़के हैं।

बच्‍चों की तरह देखभाल करती हैं मीना

मीना ने बताया कि वह इनका अपने बच्चों की तरह ही पालन-पोषण करती हैं। आज मेरे पास बहुत कुछ है। इन बच्चों के बिना मैं अधूरी हूं, यदि एक भी बच्चा कहीं चला जाता है तो बहुत दुख होता है। उन्‍होंने बताया कि उत्‍तराखंड, मेरठ, गाजियाबाद सहित कई जिलों के बेसहारा बच्चे इस परिवार का हिस्सा बने हुए हैं। दोनों दंपति सभी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद पर भी ध्यान देते हैं। इस परिवार ने अब अखिल भारतीय अनाथ और विकलांग आश्रम का रूप ले लिया है। सभी बच्चों का कहना है कि उन्हें यहां कभी भी मां-बाप की कमी महसूस नहीं होती। बच्चों का तो ये भी कहना है कि अगले जन्म हम इसी मां की कोख से जन्म लें।

अगले जन्‍म में भी मीना जैसी मां मिले

मीना की बेटी ममता ने बताया, मैं बीएड फाइनल कर चुकी हूं और यहां रहकर सभी बच्चों को पढ़ाती हूं। मैं चाहती हूं कि इन सभी को पढ़ाकर कामयाब इंसान बनाऊं। हम यहां बहुत खुश हैं। मैं भगवान से ये ही दुआ करती हूं कि अगले जन्म में इन्हीं की बेटी बनूं। बताते चलें कि भले ही ये विकलांग हैं, लेकिन यहां रहते हुए इन बच्चों को जरा भी ये महसूस नहीं होता कि‍ ये विकलांग हैं बल्कि ये खेलने के साथ-साथ पढ़ाई में भी माहिर हैं। सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।

समय-समय पर इनकी पसंद के मुताबिक, खाना बनाया जाता है, जिसे ये बच्चे बड़े चाव से खाकर अपनी पढ़ाई में जुट जाते हैं। बच्चों का सपना है कि एक दिन किसी कामयाबी की सीढ़ी पर चढ़कर इस आश्रम और इनका पालन-पोषण कर रहे दोनों दंपतियों का नाम रोशन करें। बड़े बच्चे स्कूल में रहकर छोटे बच्चों को कंप्यूटर, तबला, हरमुनियम और अन्य खेल सीखने में मदद करते हैं।

29 साल पहले हुई थी शादी 

दरअसल, बागपत जिले के निवासी वीरेंद्र राणा की शादी 29 साल पहले मुजफ्फरनगर की मीना से हुई थी। शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी जब दंपति को संतान सुख की प्राप्ति नहीं हुई तो दोनों ने डॉक्टरों का सहारा लिया। जब मीना के गर्भाशय में कैंसर होने का पता चला तो उनकी संतान प्राप्ति के सारे अरमानों पर पानी फिर गया।

 

Input By:Komal Bhardwaj

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